इस बेचैनी को
कब तक झेलेगी
पता नहीं... पर,
रोज सुबह उठना
खुद को तैयार करना
उन नजरों से, जो
रोज - रोज टकरातीं हैं
अनायास उनसे, जो घूरती हैं
उसके गर्दन से ...
हर बार आवाज़ लगाती है
बिक जाए माल,
पलेगा अपना और परिवार का पेट
महाजन भी ना तो घूरेगा
और न ही बोलेगा आना ...
बच्चे अलग रोते होंगे
पति भी पीकर होगा
किसी गन्दी नाली में पड़ा
पर यहाँ तो तमाशा बनकर
रही है बेच माल और...
हिमांशु