Tuesday, September 6, 2011

चश्मा : आर- पार

यहाँ ज़हरीली घास है 'कांग्रेस'
बन्दूक से निकली गोली की तरह
प्राण लेने  को आतुर है घास
जैसे कभी थी सोनिया की सास
जेलों में भरकर किया था नज़रबंद
वैसी ही अब दिख रही दबंग
अनर्गल आरोपों को मढ़ कर 
हाथ-पांव जोड़ कर तो कभी गर्दन पकड़ कर
दिखा रही अपनी सियासी ताकत
कर के हर तरह का त्राटक 
कोई कुछ भी बोले 
जानकर भी मुँह न खोले 
करवा कर दंगा और फसाद 
बांटती है मुआवजे का प्रसाद 
पता नहीं खून है या पानी 
रग-रग में बसी है बईमानी
सड़कों पर दिख रही है भीड़
हर किसी को हो रही है पीर
जाने कब डोलेगा यह आसन 
अब तो राजनीति है मरन्नासन
कभी इस डाल पर बैठ गाते हैं राग 
तो कभी उस डाल पर जाते हैं भाग
मलाई की मति परत देखकर 
चारा का विटामिन भी सोंखकर 
पाते ही मंत्रालय की कुर्सी 
बन जाते हैं गाय जैसे जर्सी 
सब कुछ चलता है मंथर गति से 
जैसे मारे गए हों मति से
हो-हंगामे में चलता है सदन 
नंगा हो रहा संविधान का बदन 
क्यों चिंता करें ये माटी के मूरत 
जब पांच साल बाद ही दिखानी है सूरत 

Saturday, February 5, 2011

बेचैनी

कैसा होता दिन है
और कैसी होती रात
अपना तो हर जगह ठिकाना
करता हरदम बात।

करता हरदम बात मैं
रहता हर पल खुश
जीने का यही मूल मंत्र है
नहीं तो जीवन शूल।

जीवन जो शूल बना तो
नहीं किसी के काम
इससे तो पशु अच्छे हैं
जिन चमड़ी के दाम।

मत जाओ इसके रंग पर
रत रहो अपने कर्म
पालो नहीं किसी भ्रम को
जानो उनका मर्म।

कम ज्यादा तो रीत है
नहीं तो छत की भीत
जिस पर अच्छा रंग चढ़ाओ
नयन को करता शीत।

नयन जो शीतल होगा जिनका
सुन्दर होगा सपना उनका
सपनों से जगते उम्मीद
तभी तो लेते दुनियां जीत।

Tuesday, January 25, 2011

नया दौर

रुपयों के लेन- देन में
टूट रहें हैं रिश्ते
मानवता अब बिक रही
नून- रोती से भी सस्ते.
कौन अपना और कौन पराया
फर्क करना हो गया आसान
हरे- हरे नोटों से है
तौला जा रहा इन्सान.
न तो वैसे संत हैं
और न ही वैसे भंते
क्योंकि
मानवता अब बिक रही
नून- रोती से भी सस्ते.

कहाँ गयी वो माटी की खुशबू
कहाँ गया वो रंग
खोजने पर मिलता यहाँ
गूगल सर्च इंजन के संग.
बीच नदी में बना रहे
घूमता रेस्टोरेंट
पर्वतों पर चढ़ा रहे
नित नए-नए रंग.
दधिची नाम सुनते ही
हो जाते सब सकते
क्योंकि
मानवता अब बिक रही
नून-रोटी से भी सस्ते.

मंदिर-मस्जिद लड़ रहे
पनप रहा हैवान
धोखा दे इमान को
आगे बढ रहा इन्सान.
जाते रोज सत्संग में
पाते उत्तम ज्ञान
टूट रहे हैं घर-द्वार सब
नहीं तनिक भी ध्यान
बड़े- बुजुर्ग कहा करते थे
और कह गए मरते-मरते
कि
मानवता अब बिक रही
नून-रोटी से भी सस्ते. 

Monday, November 29, 2010

फिर चेहरा रोया



हर बार खिला-खिला नजर आता है
कभी आँखों में नयापन
तो कभी चेहरे पर ताजगी
पर पता नहीं क्यों
आज उसके चेहरे की रौनक गायब है
जब भी देखा है...

हर बार देखता हूँ उसके चेहरे को
पढ़ने की कोशिश करता हूँ
बार-बार, हर बार
खोजता हूँ राज नयेपन का
फिर ढूंढता हूँ कारण
उसके जीवन में अकेलेपन का
फिर भी खुश है वह
आसपास के लोगों से
परिवेश से, प्रकृति से
पर, फिर आज गायब है
उसके चेहरे की रौनक
जब भी देखा है...

उम्र की इस तरुणाई में
यूं अकेला रहना
किसी से दिल की
बातें न कहना
सबकुछ अन्दर ही अन्दर पीना
मानों शिव बनने की
कर ली हो प्रतिज्ञा
पीना चाहती हो सारा विष
इस विषैले समाज का
देना चाहती हो मुक्ति
खुद को नहीं, समाज को
खुद से नहीं, उसके अपने आप से
वह रोती है अन्दर ही अन्दर
पर
पता नहीं क्यों ?
आज उसका चेहरा रोया है.