Tuesday, January 25, 2011

नया दौर

रुपयों के लेन- देन में
टूट रहें हैं रिश्ते
मानवता अब बिक रही
नून- रोती से भी सस्ते.
कौन अपना और कौन पराया
फर्क करना हो गया आसान
हरे- हरे नोटों से है
तौला जा रहा इन्सान.
न तो वैसे संत हैं
और न ही वैसे भंते
क्योंकि
मानवता अब बिक रही
नून- रोती से भी सस्ते.

कहाँ गयी वो माटी की खुशबू
कहाँ गया वो रंग
खोजने पर मिलता यहाँ
गूगल सर्च इंजन के संग.
बीच नदी में बना रहे
घूमता रेस्टोरेंट
पर्वतों पर चढ़ा रहे
नित नए-नए रंग.
दधिची नाम सुनते ही
हो जाते सब सकते
क्योंकि
मानवता अब बिक रही
नून-रोटी से भी सस्ते.

मंदिर-मस्जिद लड़ रहे
पनप रहा हैवान
धोखा दे इमान को
आगे बढ रहा इन्सान.
जाते रोज सत्संग में
पाते उत्तम ज्ञान
टूट रहे हैं घर-द्वार सब
नहीं तनिक भी ध्यान
बड़े- बुजुर्ग कहा करते थे
और कह गए मरते-मरते
कि
मानवता अब बिक रही
नून-रोटी से भी सस्ते. 

Monday, November 29, 2010

फिर चेहरा रोया



हर बार खिला-खिला नजर आता है
कभी आँखों में नयापन
तो कभी चेहरे पर ताजगी
पर पता नहीं क्यों
आज उसके चेहरे की रौनक गायब है
जब भी देखा है...

हर बार देखता हूँ उसके चेहरे को
पढ़ने की कोशिश करता हूँ
बार-बार, हर बार
खोजता हूँ राज नयेपन का
फिर ढूंढता हूँ कारण
उसके जीवन में अकेलेपन का
फिर भी खुश है वह
आसपास के लोगों से
परिवेश से, प्रकृति से
पर, फिर आज गायब है
उसके चेहरे की रौनक
जब भी देखा है...

उम्र की इस तरुणाई में
यूं अकेला रहना
किसी से दिल की
बातें न कहना
सबकुछ अन्दर ही अन्दर पीना
मानों शिव बनने की
कर ली हो प्रतिज्ञा
पीना चाहती हो सारा विष
इस विषैले समाज का
देना चाहती हो मुक्ति
खुद को नहीं, समाज को
खुद से नहीं, उसके अपने आप से
वह रोती है अन्दर ही अन्दर
पर
पता नहीं क्यों ?
आज उसका चेहरा रोया है.

Saturday, October 16, 2010

समय का प्रवाह

वह समय का प्रवाह ही था
जिसने दिखाया था मुझे रास्ता
जिसने दी थी मुझे एक मंजिल
जिसमे मैंने छुआ था एक किनारा
वह समय का प्रवाह ही था कि...

अभी भी समय का ही प्रवाह है
मैं बहता जा रहा हूँ निरंतर
जैसे बहती हुई नदी
मिलती है समंदर से
लेती है बड़ी आकर
अपने अस्तित्व को खोकर
देती है उस समंदर को अपना सामर्थ्य
क्योंकि बहते रहने से ही
बनी रहती है उसकी सार्थकता
यह समय का ही प्रवाह है कि ...

आज मैं हूँ  उस जगह
जहाँ देखना चाहता था खुद को
अपने अस्तित्व को
जहाँ देना चाहता हूँ अपना सामर्थ्य
दिखाना चाहता हूँ अपनी काबिलियत
महसूसना चाहता हूँ उनका अहसास
देखना चाहता हूँ उनके चेहरों पर
अपने लिये ख़ुशी का इजहार
दूसरों के लिये निश्चिंतता
और फिर बहना चाहता हूँ
अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये
अपने आपको जिन्दा रखने के लिये
दे सकूं उन्हें भी अपना कुछ समय
जिन्हें नहीं देखना चाहता हमारा समाज
जिन्हें घूरती नजरों से भी नहीं देखते हम
आँखों की पलकें भींच लेते हैं
सामने आ गए तो
अनायास मुंह में भर आता है थूक
उनके पास से गुजरने के बाद
बांयी तरफ देते हैं थूक
रुमाल से चेहरे को साफ कर
निकल पड़ते हैं आगे.
पर समय का प्रवाह
निरंतर बहता है
बनकर सरस और सलिल
यही तो है समय का प्रवाह.

Sunday, October 10, 2010

फिर चला मैं नई राह...

फिर चला मैं नई राह
उन कदमों को पीछे छोड़
करने को कुछ नई सोच
जानी अनजानी राहों पर
फिर चला मैं नई राह...

मुश्किल है उनको समझाना
जिसने बस घर को ही जाना
बाहर निकल कर बाजू भी देख
दूसरों से नज़र मत फेर
बड़ी जालिम लगती है दुनिया
निकला हूँ कुछ सोच कर
फिर चला मैं नई राह...

उबड़ खाबड़ पथरीले हैं
कही चौड़े तो कहीं सकरे हैं
आड़े तिरछे, ऊपर नीचे
खुली आँख कभी आँख मिचे
फिर चला मैं नई राह ...

Tuesday, March 9, 2010

नारी : नई पालिसी

घर में लड़के का
जन्म लेना
एलआइसी की तरह
सौ प्रतिशत
सुरक्षित भविष्यनिधि है।

हर साल जमा करो
प्रीमियम
पालिसी मेच्योर (शादी करने लायक)
होते ही
बनता है वह कल्पतरु।

जितना चाहो
उतना दूह लो
फिर लाओ घर
बहू।

इस बहू ने
फिर बनाया
एक नया टेबल (लड़का / लड़की जनने पर)
जो बनेगा सास- ससुर
के लिये पेंशन प्लान।

फिर क्यों तिरस्कृत
करते हैं इस
नारी को
जो हर साल
तैयार करती है
जीवन बीमा की
नई पालिसी।