Monday, February 16, 2026

हिंदी व्यंजन

हिंदी की रोटी
हिंदी का साग
बिंदु की छौंक
और बिंदु की बात।

आकार की लकड़ी
और एकार की आग
क वर्ग है मेथी
तो च वर्ग है तेल।

जब ट वर्ग हो प्याज
तो देखो त वर्ग का खेल
प वर्ग है नमक
और य वर्ग है रस।

स्वाद लेकर देखिए
फिर कहिये है न
हिंदी व्यंजन सरस।

Monday, May 16, 2016

शिप्रा नदी के घाट पर भए संतन की भीड़

उज्जैन में लगे सिंहस्थ कुंभ में संतों की भिड़ंत और उसमें भी गोलीबारी ने तो उनके होने की परिभाषा ही बदल डाली। अब तक पढ़ता आया हूं  - जात न पूछो साधु की, पूछ लीजो ज्ञान। मोल करो तलवार की, पड़ा रहन दो म्यान। लेकिन यहां यह क्या उपाधि लेने-देने से लेकर पहला स्नान करने तक की बात पर ही संतों ने तमंचे निकाल लिए और करा दिया प्रशासन को डिस्को। भाई गंगा-जमुनी की संस्कृति वाले इस देश में तो पहले आप, नहीं पहले आप वाली बात रही है। यह बात भी किसी आम आदमी ने कही बल्कि संतों ने ही आम आदमी को समझाया था। फिर यही लोग बवेला मचाने लगे हैं। सब  गडमड हो रहा है। ये संत अपने नाम के आगे श्री श्री 1008, जगत्गुरु, शंकराचार्य, करपात्री, बापू, संत, महामंडलेश्वर और न जाने कौन-कौन सा प्रत्यय और उपसर्ग जोड़े जा रहे हैं। ना तो इन्हें कोई रोकने वाला है और ना ही कोई बोलने वाला। भला इन्हें कुछ भी कहने का खतरा कौन मोल ले।
कुंभ ही क्यों
मैं आज तक यह नहीं समझ पाया कि आखिर कुंभ के मेले में ही इनकी भिड़ंत क्यों होती है? जबकि सांसरिक ज्ञान के अनुसार, कुंभ के मेले में अक्सर भाई बिछड़े होते हैं। ये संत तो स्वयं घरवालों से बिछड़कर यहां आते हैं तो फिर लड़ाई किस बात की? पद्वी पाने या नाम धारण करने की प्राचीन और बेहतर परम्परा शास्त्रार्थ की रही है, लेकिन अब ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा है। 
पहले परोकार, अब कारोबार
संत हमेशा से परोकारी रहे हैं, लेकिन बदलते परिवेश ने उन्हें कारोबारी बना दिया है। उदाहरण ना भी दूं तो चार-पांच के नाम तो आप स्वयं तय कर लेंगे जिनके कारोबार भारतीय रुपए में छोड़ दें तो डॉलर में भी करोड़ों डॉलर के जरूर होंगे। कोई सोने-चांदी से लकदक है तो कोई अगरबत्ती-धूप-चंदन और मैग्जिन से ही इतनी कमाई कर रहा है कि उनका वैभव सात समंदर पार तक दिखता है। कुंभ में ही देखिए महापंडितों के पास विदेशी गाडिय़ों की संख्या किसी फिल्मी सितारे या फिर नामी-गिरामी खिलाडिय़ों से कतई कम नहीं है। दान-पुण्य का सिलसिला हमारे यहां इतना है कि हम मूर्तियों को भी स्वर्णजडि़त कर देते हैं ये तो फिर भी जीते-जागते इंसान हैं! 
तो हम किसे पूजें?
हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल कि किसे पूजें? कोई संत दुष्कर्म के आरोप में तो कोई बम विस्फोट के आरोप में जेल में सजा काट रहे हैं। कई और बाबाओं पर कुछ ना कुछ आरोप लगते रहे हैं। कुछ बाबा ऐसे हैं जो ख्याति अर्जित करने के लिए ऐसे बयान दे डालते हैं जिनका ना तो सिर होता और ना ही कोई पैर। ऐसी बातें समाज को समरस कभी नहीं बना सकतीं। और तो और कोई फिल्म बनाकर अपनी कीर्ति स्थापित करना चाहते हैं एक साध्वी ऐसी हैं जो भगवान को रिझाते-रिझाते भक्तों की गोद में बैठ उन्हें रिझाने लगती हैं। भला ऐसे में अनुयायी किस प्रकार का ज्ञान अर्जन करेंगे और किसे पूजेंगे?

Friday, August 7, 2015

बहुत प्यार करती हूं

बहुत प्यार करती हूं
हर पल याद करती हूं।
पर्स में तुम्हारी फोटो है
जब भी जी चाहा
देख लेती हूं।
कल मेरी आंखों में
यूं ही आंसू आ गए
लगा तुम्हें कोई दर्द है।
गला भी अचानक
सूखने लगा
जैसे तुम्हें प्यास लगी हो।
मन को बहुत मनाया कि
सबकुछ ठीक होगा,
व्यर्थ में चिंता करती हूं।
अब कुछ भी तो नहीं रहा
हमारे और तुम्हारे बीच
फिर क्यों तुम्हें
याद करती हूं।
सच कहूं, बुरा तो नहीं मानोगे
मैं, तुमसे अब भी प्यार करती हूं।
मैं निस्तब्ध सुन रहा था
जवाब के लिए
शब्द ढूंढ रहा था।
आखिर क्या करता
फैसला अकेले का नहीं था
दोनों ने पहले ही
सहमति बना ली थी।
प्यार के लिए
मां-बाप को नहीं
छोड़ सकते थे
ना ही बिना इजाजत
शादी कर उनको
समाज की तानें
सुनने दे सकते थे।
फिर भी अचानक से
उसका फोन पर
यह कहना
मैं, तुमसे अब भी
प्यार करती हूं
आंखों से गिरे
आंसू के गर्म
बूंद लग रहे थे।

Thursday, May 23, 2013

सिगरेट का धुआं

महंगाई  दिनोंदिन बढ़ती जा रही
जैसे बढ़ता था सुरसा का शरीर
रुकने का कोई नाम नहीं
गद्दी पर बैठे हैं कई 'बालवीर'
कहीं दिखाई देती मंथरा
तो कहीं दिखती केकयी।
' सूर्पनखा' भी कम नहीं
यहाँ की ' राज' सभा में
जब देखो तब
किसी के पक्ष में
करती है अपना मतदान.
जनता की कमाई का
आधा हिस्सा तो
बजट में फूँक डालते हैं
बाकी बचे को भी
अपनी एसी कार की टंकी
में डाल देते हैं।
बेचारे इन ' जन' को
क्या मिलता है?
छोटा वाला सिगरेट
मुंह से लगा सुलगाते हैं
और कुछ ही पल में
जिन्दगी को धुंए का
छल्ला बना उड़ाते हैं।

Monday, May 14, 2012

माँ और बच्चा

जन्म लेने से पहले ही
पेट मे लात मारता  है बच्चा
बिना परवाह किये ही
अपना हिस्सा लेता है बच्चा।
जन्म लेने के बाद माँ की
छाती से चिपकता है बच्चा
जिंदा रहने के लिए भी
माँ का दूध पिता है बच्चा।
वर्णमाला सीखने  से पहले
माँ बोलता है बच्चा
माँ सामने नहीं देखकर
रोने लगता है बच्चा।
माँ की दो अंगुलियाँ थामकर
धरती पर पग धरता  है बच्चा
रिश्ते नाते इनको भी
माँ से ही सीखता है बच्चा।
इमदाद के लिए भी
माँ पुकारता है बच्चा
जब दौड़ती है माँ तो
खिलखिलाता है बच्चा।

बच्चे को तैयार कर
स्कूल भेजती है माँ
हल्की  चोट लगने पर भी
रोने लगती है माँ।
भूख प्यास सबकी
चिंता करती है माँ
भूखी रहकर भी बच्चों का
पेट पलती है माँ।
बच्चे को हर पल बड़ा
होता देखती है माँ
देर से घर आने को
खूब समझती है माँ।
सच बोलने मे  भी
झूठ पकडती है माँ
ठेस पहूँचाने पर भी
गले लगाती है माँ।

घर मे  बहू आने पर
चितचोर होती है माँ
आपनी अनदेखी पर भी
चुप रहती है माँ।
अब चार शाम की जगह
दो शाम खाना खाती है माँ
स्वर्ग जैसे घर की जगह
ओल्ड एज होम में दिखती है माँ।
चेहरे पर शून्य भाव लिए
राम नाम भजती  है माँ
बेटा-बहू  की लड़ाई का
मर्म जानती है माँ। 

Thursday, March 29, 2012

सपनों की उड़ान

सपनों को पंख न जाने
कब से लगने लगे थे.
मैंने तो उसे बस देखने
की कोशिश मात्र की थी.
न जाने किस रात को
अचानक से तारों के बीच
जा पहुंचा था मैं.
तैरने लगा था अपने ही
बुने हुए सुनहरे सपनों में
लग रहा था जैसे
सूरज कर रहा था
मेरे ही आने की प्रतीक्षा.
मुझे देखते ही खिल उठा वो
इस नीले आसमान में.
मेरे पलक झपकते ही
छुप गया वो बादलों की ओट में.
मेरे थकने के साथ ही
वो भी ढलने लगा
या फिर यूं कहिये
चाँद को आने देना चाह रहा था
रात होने देने के लिए
ताकि हर कोई देख सके
अपने सपनों की जहाँ को.

Thursday, March 1, 2012

सरहद : अनदेखी लकीर

पता नहीं कैसे बन गए
दो मुल्कों में फासले
सीमाओं पर नहीं दिखता
कहीं मिट्टी के रंगों में अंतर
और ना ही बहती है हवा
उल्टी दिशाओं में.
फिर,
किसने खींच दी
हमारे रिश्तों के बीच
खून की लकीरें.
वही पानी का दरिया
यहाँ हमारी प्यास बुझाता है
वहां जाने के बाद
खेतों में पटवन के
काम आता है.
जिस सूरज के उगने पर
जागतें हैं हम
उसी सूरज के चमकने से
खिलखिलाते हैं वो.
जिस चाँद की रौशनी में
नहलाते हैं हम
उसी चांदनी रात में
घर लौटते हैं वो.
कहीं भी तो नहीं
दिखता है अंतर
फिर,
क्यों तरेरतें हैं
एक दूसरे पर नज़रों को.
जिस कपड़े से ढकते हैं
हम अपना तन
उन्हीं कपड़ों से
ढका होता है उनका मन.
जिन अनाजों से
मिटती है हमारी भूख
वही अन्न के दाने
बनाते हैं उन्हें रसूख.
बताओ मुझे एक भी कारण
हो कहीं जमीं आसमान में अंतर
फिर, क्यों
एक दूसरों की
माँ-बेटी करतें हैं एक.

Tuesday, February 28, 2012

समाज की कसौटी

लाज के मारे झुकी हुई आँखें
पूरे मुखड़े को ढका हुआ
सिर पर चढ़ा पल्लू
कलाई से केहुनी तक
चढ़ी हुई कांच की
सतरंगी चूड़ियाँ
पैर की अंगुरियों में
कसी हुई चमकती बिछिया
हमारी सभ्यता की सांचे में
कसी हुई नारी की
यही परिभाषा है.
पर, इन्हें देखने वालों का
कुछ नजरिया भी अलहदा है
मुलायम कूचियों से
खिची गई रेखा
चेहरे पर अंगूठे
के सहारे बनाया दाग
हाथ के छिटकने से
तस्वीर पर पड़ी छीटें
कहीं आँखों में लगे
मोटे काजर को पसारते
मानों दर्द के ढबकने से
बाहर आते-आते रह गए।
किसी एक ने देखा तो
दर्द को महसूसते
चित्रकार को बधाई दी
प्रदर्शनी देखने आई भीड़ भी
मर्दानगी का दामन
छोड़ नहीं पाई
दबी, कुचली और फिर
वारांगना या वारवधू
कहने पर भी "ना' मर्दों का
मुंह बंद नहीं करा पायी। 

Thursday, December 22, 2011

देश की दिशा

टू जी, अन्ना औए एफडीआई
बहरी हो गयी कांग्रेस (आई )
नहीं सुन रही जनता की आवाज़
उसे लग रहा सबकुछ बकवास.
गरीब होने की बदल गयी परिभाषा
फिर भी रखती उसी से आशा.
राजा, कनिमोझी या कलमाड़ी
देश को समझा खुद की थाती.
जनता मांग रही अधिकार
बदले मिल रह मात्र प्रतिकार.
क्या हो गया  इस देश को
नेता बदल रहे खुद भेस को
घोटालों में नाम है इनका
गरीब हो रहा तिनका- तिनका
बड़ों- बड़ों को धुल चटाया
मिटटी मिला आतंक मिटाया
पलट कर देखो जरा इतिहास
फिर होगा तुम्हें विश्वास
जेलों में जब होंगे भ्रष्टाचारी
अवाम होगा फिर आभारी.          

Friday, September 16, 2011

कोर्ट में हिंदी का बयान

हुज़ूर, माई-बाप
दुहाई है सरकार
पता नहीं,
क्या है मेरा अपराध।
कई भाषाओं को
दिया है मैंने जन्म
दिया उन्हें संसार में
फैल जाने का ज्ञान
फिर भी, मुझे
सहना पड़ रहा है अपमान।
यहाँ इस कठघरे में
खड़ी मैं
सोच रही हूँ
जीवित रहने का उपाय
वहां मेरे पोषक
पहना रहे मुझे
फूलों का हार
मेरी इज्जत को बार-बार
करते हैं तार-तार
साल के पूरे दिन
मैं रहती उनके साथ
हुज़ूर, माई-बाप.
दुहाई है सरकार
मैं जो कहूँगी
सच कहूँगी
सच के सिवा
कुछ नहीं कहूँगी
मुझे याद नहीं
किसी भाषा का जन्मदिन
न ही मुझे याद
किसी भाषा की सालगिरह
हाँ, शुभ कर्मों के लिए
लोग उलटते हैं पंचांग
देखते हैं दंड और पल
फिर भी,
आज मैं खड़ी हूँ निर्बल.
कोई सहारा नहीं देना चाहता
बस यूं ही
कागज पर पड़ा देखना चाहता
अस्पताल में उस मरीज की तरह
जो अंतिम साँस के लिए
कर रहा हो जिरह
हुज़ूर, माई-बाप
दुहाई है सरकार.
मैं मरना नहीं चाहती
बेमौत
पर, सजा मिलने से पहले
पूछना चाहती हूँ कि
कब भारत और इंडिया
में मिटेगा भेद
कब लोगों का
हिंदी से ही भरेगा पेट.

Tuesday, September 6, 2011

चश्मा : आर- पार

यहाँ ज़हरीली घास है 'कांग्रेस'
बन्दूक से निकली गोली की तरह
प्राण लेने  को आतुर है घास
जैसे कभी थी सोनिया की सास
जेलों में भरकर किया था नज़रबंद
वैसी ही अब दिख रही दबंग
अनर्गल आरोपों को मढ़ कर 
हाथ-पांव जोड़ कर तो कभी गर्दन पकड़ कर
दिखा रही अपनी सियासी ताकत
कर के हर तरह का त्राटक 
कोई कुछ भी बोले 
जानकर भी मुँह न खोले 
करवा कर दंगा और फसाद 
बांटती है मुआवजे का प्रसाद 
पता नहीं खून है या पानी 
रग-रग में बसी है बईमानी
सड़कों पर दिख रही है भीड़
हर किसी को हो रही है पीर
जाने कब डोलेगा यह आसन 
अब तो राजनीति है मरन्नासन
कभी इस डाल पर बैठ गाते हैं राग 
तो कभी उस डाल पर जाते हैं भाग
मलाई की मति परत देखकर 
चारा का विटामिन भी सोंखकर 
पाते ही मंत्रालय की कुर्सी 
बन जाते हैं गाय जैसे जर्सी 
सब कुछ चलता है मंथर गति से 
जैसे मारे गए हों मति से
हो-हंगामे में चलता है सदन 
नंगा हो रहा संविधान का बदन 
क्यों चिंता करें ये माटी के मूरत 
जब पांच साल बाद ही दिखानी है सूरत 

Saturday, February 5, 2011

बेचैनी

कैसा होता दिन है
और कैसी होती रात
अपना तो हर जगह ठिकाना
करता हरदम बात।

करता हरदम बात मैं
रहता हर पल खुश
जीने का यही मूल मंत्र है
नहीं तो जीवन शूल।

जीवन जो शूल बना तो
नहीं किसी के काम
इससे तो पशु अच्छे हैं
जिन चमड़ी के दाम।

मत जाओ इसके रंग पर
रत रहो अपने कर्म
पालो नहीं किसी भ्रम को
जानो उनका मर्म।

कम ज्यादा तो रीत है
नहीं तो छत की भीत
जिस पर अच्छा रंग चढ़ाओ
नयन को करता शीत।

नयन जो शीतल होगा जिनका
सुन्दर होगा सपना उनका
सपनों से जगते उम्मीद
तभी तो लेते दुनियां जीत।

Tuesday, January 25, 2011

नया दौर

रुपयों के लेन- देन में
टूट रहें हैं रिश्ते
मानवता अब बिक रही
नून- रोती से भी सस्ते.
कौन अपना और कौन पराया
फर्क करना हो गया आसान
हरे- हरे नोटों से है
तौला जा रहा इन्सान.
न तो वैसे संत हैं
और न ही वैसे भंते
क्योंकि
मानवता अब बिक रही
नून- रोती से भी सस्ते.

कहाँ गयी वो माटी की खुशबू
कहाँ गया वो रंग
खोजने पर मिलता यहाँ
गूगल सर्च इंजन के संग.
बीच नदी में बना रहे
घूमता रेस्टोरेंट
पर्वतों पर चढ़ा रहे
नित नए-नए रंग.
दधिची नाम सुनते ही
हो जाते सब सकते
क्योंकि
मानवता अब बिक रही
नून-रोटी से भी सस्ते.

मंदिर-मस्जिद लड़ रहे
पनप रहा हैवान
धोखा दे इमान को
आगे बढ रहा इन्सान.
जाते रोज सत्संग में
पाते उत्तम ज्ञान
टूट रहे हैं घर-द्वार सब
नहीं तनिक भी ध्यान
बड़े- बुजुर्ग कहा करते थे
और कह गए मरते-मरते
कि
मानवता अब बिक रही
नून-रोटी से भी सस्ते. 

Monday, November 29, 2010

फिर चेहरा रोया



हर बार खिला-खिला नजर आता है
कभी आँखों में नयापन
तो कभी चेहरे पर ताजगी
पर पता नहीं क्यों
आज उसके चेहरे की रौनक गायब है
जब भी देखा है...

हर बार देखता हूँ उसके चेहरे को
पढ़ने की कोशिश करता हूँ
बार-बार, हर बार
खोजता हूँ राज नयेपन का
फिर ढूंढता हूँ कारण
उसके जीवन में अकेलेपन का
फिर भी खुश है वह
आसपास के लोगों से
परिवेश से, प्रकृति से
पर, फिर आज गायब है
उसके चेहरे की रौनक
जब भी देखा है...

उम्र की इस तरुणाई में
यूं अकेला रहना
किसी से दिल की
बातें न कहना
सबकुछ अन्दर ही अन्दर पीना
मानों शिव बनने की
कर ली हो प्रतिज्ञा
पीना चाहती हो सारा विष
इस विषैले समाज का
देना चाहती हो मुक्ति
खुद को नहीं, समाज को
खुद से नहीं, उसके अपने आप से
वह रोती है अन्दर ही अन्दर
पर
पता नहीं क्यों ?
आज उसका चेहरा रोया है.

Saturday, October 16, 2010

समय का प्रवाह

वह समय का प्रवाह ही था
जिसने दिखाया था मुझे रास्ता
जिसने दी थी मुझे एक मंजिल
जिसमे मैंने छुआ था एक किनारा
वह समय का प्रवाह ही था कि...

अभी भी समय का ही प्रवाह है
मैं बहता जा रहा हूँ निरंतर
जैसे बहती हुई नदी
मिलती है समंदर से
लेती है बड़ी आकर
अपने अस्तित्व को खोकर
देती है उस समंदर को अपना सामर्थ्य
क्योंकि बहते रहने से ही
बनी रहती है उसकी सार्थकता
यह समय का ही प्रवाह है कि ...

आज मैं हूँ  उस जगह
जहाँ देखना चाहता था खुद को
अपने अस्तित्व को
जहाँ देना चाहता हूँ अपना सामर्थ्य
दिखाना चाहता हूँ अपनी काबिलियत
महसूसना चाहता हूँ उनका अहसास
देखना चाहता हूँ उनके चेहरों पर
अपने लिये ख़ुशी का इजहार
दूसरों के लिये निश्चिंतता
और फिर बहना चाहता हूँ
अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये
अपने आपको जिन्दा रखने के लिये
दे सकूं उन्हें भी अपना कुछ समय
जिन्हें नहीं देखना चाहता हमारा समाज
जिन्हें घूरती नजरों से भी नहीं देखते हम
आँखों की पलकें भींच लेते हैं
सामने आ गए तो
अनायास मुंह में भर आता है थूक
उनके पास से गुजरने के बाद
बांयी तरफ देते हैं थूक
रुमाल से चेहरे को साफ कर
निकल पड़ते हैं आगे.
पर समय का प्रवाह
निरंतर बहता है
बनकर सरस और सलिल
यही तो है समय का प्रवाह.

Sunday, October 10, 2010

फिर चला मैं नई राह...

फिर चला मैं नई राह
उन कदमों को पीछे छोड़
करने को कुछ नई सोच
जानी अनजानी राहों पर
फिर चला मैं नई राह...

मुश्किल है उनको समझाना
जिसने बस घर को ही जाना
बाहर निकल कर बाजू भी देख
दूसरों से नज़र मत फेर
बड़ी जालिम लगती है दुनिया
निकला हूँ कुछ सोच कर
फिर चला मैं नई राह...

उबड़ खाबड़ पथरीले हैं
कही चौड़े तो कहीं सकरे हैं
आड़े तिरछे, ऊपर नीचे
खुली आँख कभी आँख मिचे
फिर चला मैं नई राह ...

Tuesday, March 9, 2010

नारी : नई पालिसी

घर में लड़के का
जन्म लेना
एलआइसी की तरह
सौ प्रतिशत
सुरक्षित भविष्यनिधि है।

हर साल जमा करो
प्रीमियम
पालिसी मेच्योर (शादी करने लायक)
होते ही
बनता है वह कल्पतरु।

जितना चाहो
उतना दूह लो
फिर लाओ घर
बहू।

इस बहू ने
फिर बनाया
एक नया टेबल (लड़का / लड़की जनने पर)
जो बनेगा सास- ससुर
के लिये पेंशन प्लान।

फिर क्यों तिरस्कृत
करते हैं इस
नारी को
जो हर साल
तैयार करती है
जीवन बीमा की
नई पालिसी।